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Wednesday, December 19, 2012

इक मुलाक़ात सोंधी सी....

मेरी बेचैन नसों में
क्या दौड़ रहा है...
तुम्हें मालूम हो तो..
मुझे बता देना..
स्पर्श ने तुम्हारे..
अनजाना,अनबूझा सा..
जो साज़ छेड़ा था...
बनके राज़..
मेरी बेजान नसों को..
वो जगा गया
अँधेरे कमरे के..
कोने पे बैठे तुम...
अपना उजाला...
मुझपे उढ़ेल गए
मैं किनारे पे खड़ी..
संवेदनहीन शिला सी..
भीगती रही..
उफनती , उतरती ...
लहरों से तुम्हारी..
कहो न मुझसे..
बोलो ना
ये जो महक रही है..
मुझमें...
वो सोंधी सी गंध...
तुम्हारी तो नहीं....?

2 comments:

Johny Samajhdar said...

क्या बात है - बहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति है भावनाओं की | धीरे धीरे ठराव आ रहा है जिंदगी में | मैं खुश हूँ तुम्हारे लिए | बहुत खुश |

खिड़कियाँ खुल गईं
खुशियाँ आने लगीं
प्यार की महक भी
फिजां में सामने लगी
अरमानो की ड़ाल पर
ख्वाहिशें चेह्चाने लगीं
तुझको ऐसे देख कर
दिल यह बाग बाग है
जी ले जी भर के इसे
जो भी तेरा ख़्वाब है
जिंदगी बस यही है
एक रोशन महाताब है...

laveena rastoggi said...

शुक्रिया भाई ..हौसला अफजाही के लिए ... फिर से फॉर्म में आने की कोशिश कर रही हूँ ...