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Thursday, March 2, 2017

Wednesday, February 22, 2017


                                       

न नौकरी बापू की , न माँ का श्रृंगार…
न धुले हुए चेहरे , न फूलों वाली फ्रॉक…
न साइकिल ,न झूले , न चटपटे स्वाद…
हर फूल गुलिस्तां का सरताज़ नहीं होता…
बचपन खिलौनों का मोहताज़ नहीं होता…
- लवीना रस्तोगी
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Friday, August 9, 2013

ख्वाजा मेरे ख्वाजा

मेरे गुनाह कभी मेरी नेकी से बड़े थे...
वर्ना तेरे दर पर रहमतों की कमी न थी 

घर से चला था तो थे और सूरत ऐ हालत ...
दर से तेरे चला तो मेरी शख्सियत और थी 

लब न खुले तलक न जुबां हिली मेरी ...
तूने दिया वो भी जो दर्खास्त मेरी न थी 

शिकवे इस जहाँ से होते थे तब तलक...
रहमत ऐ नूर से जब मुलाकात मेरी न थी
 

Thursday, August 8, 2013

तेरा आना तक नागवार गुज़रा.....
तेरे इंतज़ार से कुछ यूँ मुहब्बत की हमने.......

Saturday, December 29, 2012

पीड़िता की मौत ...
सुबह सुबह न्यूज़ चैनल पर नज़र पड़ी ..लड़खड़ाती उंगलियाँ रिमोट पर आशंकित मन से ठहर गयीं ..पूर्वाग्रह युक्त दहशत मन पर हावी हो गयी। " पीड़िता की मौत " ! साफ़ समाचार था।।पर पीड़िता तो लाखों हैं हैं इस देश में ... वो बात अलग है की पीड़ित होने की कभी वजह अलग होती है तो कभी तरीक़े  ! और फिर उस गैंग रेप की शिकार लड़की को पीड़िता क्यूँ कहा जाए  ..? उसे तो नए युग की "झाँसी की रानी " कहना चाहिए जो लड़ते लड़ते शहीद हो गयी। जंग न सिर्फ जिंदगी की बल्कि एक नपुंसक सोच की ..वही सोच जो हमें पुत्र जन्म से पहले ही पुत्र प्राप्ति की इच्छा के रूप में जन्म ले लेती है। पुत्र के माता पिता होना एक गौरवान्वित अनुभव लगता है , पुत्र के जन्म लेते ही लगता है कि जैसे कोई मेडल मिल गया हो। और सारा जीवन आप उस मेडल को अपनी उपलब्धि मानते हैं। कभी प्रयास तक नहीं करते कि उस मेडल को अच्छे भावनात्मक रिश्तों की समझ , नारी का सम्मान आदि संस्कारों से चमकाएं। बल्कि बड़े होते पुत्र के समक्ष " आजकल की लडकियां तो ..." सरीखे बहुत से कटाक्ष करते हैं। की कहीं पुत्र किसी भावनात्मक मोह जाल में न उलझ जाए। और हमारा मेडल पराया न हो जाए ...यही सब सोचते सोचते फिर से न्यूज़ अपडेट पर नज़र गयी "पीड़िता की मौत" ...आँखों से दो आंसू टपके और खिसियाई हुई सी एक फीकी मुस्कान आई ... और लो हो गयी एक और पीड़िता खामोश  !

Wednesday, December 19, 2012

इक मुलाक़ात सोंधी सी....

मेरी बेचैन नसों में
क्या दौड़ रहा है...
तुम्हें मालूम हो तो..
मुझे बता देना..
स्पर्श ने तुम्हारे..
अनजाना,अनबूझा सा..
जो साज़ छेड़ा था...
बनके राज़..
मेरी बेजान नसों को..
वो जगा गया
अँधेरे कमरे के..
कोने पे बैठे तुम...
अपना उजाला...
मुझपे उढ़ेल गए
मैं किनारे पे खड़ी..
संवेदनहीन शिला सी..
भीगती रही..
उफनती , उतरती ...
लहरों से तुम्हारी..
कहो न मुझसे..
बोलो ना
ये जो महक रही है..
मुझमें...
वो सोंधी सी गंध...
तुम्हारी तो नहीं....?