Featured Post

Monday, May 16, 2011

नया आसमा


दौर ए वक़्त ऐसा भी हमने देखा
समन्दरों को साहिलों से बचते देखा

 जंग गैरों से होती , तो ताज मेरा था
शिकस्त पे अपनी , अपनों को हँसते देखा

डूबता जान मुझे जो तमाशबीन हुए
बेबसी पे अपनी उन्हें हाथ मलते देखा


बाहें फैलाये नया आसमा बुलाता है मुझे
यूँ तो बहुतों को मिटटी में मिलते देखा..!!
 

Friday, January 28, 2011

माँ

जब जब रात गहनाती है..
और कालिख चढ़ती जाती है..
मैं डर के सिमट जाती हूँ..
अपनी चादर में पैर मोड़े..
आँखें भींचें, छुप जाती हूँ
वो आवाजें , वो दहशतें..
धीमी होती जाती हैं..
मैं चुपके से , एक आँख खोले..
और एक आँख भींचे..
चादर सरकाती हूँ ..
फिर कोई नहीं जान..
चैन से सो जाती हूँ !
जब जब आँखों के कोने ..
एकांत में भीग जाते हैं..
तब यूँ ही किसी बात पे..
रोते रोते हंस जाती हूँ !
जब जब धूप में ..
जल्दी जल्दी चलते भी..
बस निकल जाती है..
और चमकते सूरज को..
चिढ़ के मैं देखती हूँ..
तभी यकायक ...
एक और बस आ जाती है..
और मैं इठलाती हुई ..
बस में चढ़ जाती हूँ !
कोई माने ना माने..
पर मुझको पता है..
राह पथरीली ही सही..
पर मेरे हर कदम पे..
" माँ  " तेरा आँचल बिछा है...!!!!