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Monday, February 22, 2010

....अक्स....



आँखों में तारे भर के...
झूमती है चितवन मेरी....
पीती हूँ वादियाँ..
मैं आजकल...
बस्ती की गंदगी भी..
अटखेलियाँ करती है..
चूम लेती हूँ
मैले गाल भी....
रिसती रही हूँ ..
खुद में..
मैं बन के .. 'तुम'
अब कौन जाने..
'अक्स' किसका है ..
..आईने में..!!