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Tuesday, June 23, 2009

मत जाओ माँ---


वक्त है ये कैसा….
ये कैसा धुआं है…
पिघलती बर्फ से…..
मैं जमी जाती हूँ…
आँखें बंद करके..
लेटती हूँ जैसे ही….
चीत्कार सुन….
काँप जाती हूँ….
कोई तो है जो….
सिसक रहा है…
कहाँ से ये आवाज़ आती है..
पागलो सी ढूंढती हूँ…
यहीं कहीं कोई….
मातम कर रहा था…
सच में….
कोई था….
ह्रदय को उसकी …
तीस सालती है…
पर दीखता नही कोई….
बियावान वन सा….
मेरा अस्तित्व….
खोजता है उसे….
जैसे बिखरे बालो में ….
कोई दार्शनिक ढूंढता है..
अपनी कविता का शीर्षक…
पर कोई नही दीखता….
मैं निरीह सी….
बिस्तर पर गिर….
ख़ुद को समझाती हूँ….
ऐसा ही होता है….
जब आसमा ….
सर से सरकता है….
और ज़मी जाने को होती है…

14 comments:

Pyaasa Sajal said...

Bahut setimental hai...gazab ka likha hai aapne...chaliye lamba break liya par vaapsi zordaar hai

अनिल कान्त : said...

its too sentimental...and heart touching.....maa se badhkar kuchh nahi hota

laveena said...
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laveena said...
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laveena said...

Maa....sach me bas Maa hi hoti hai...koi shabd koi paribhasha iske samtulya nahi...
fir bhi ... Sajal nd Anil..hausla afjahi ke liye shukriya.

I, Me & Myself said...

i can't comment anything bcos i am speechless after reading all this. U really have a heart of gold yaar. I really cried after reading this poem. Very well written. Ma jaisa sach mein koi nahi.

Harkirat Haqeer said...

लवीना जी ,

उम्मीद है अब तक आपने खुद को ढूंढ लिया होगा ....आपके अन्दर एक कवि दिल बैठा है ...तभी तो इतने अच्छे शब्द जोड़ पाई हैं ....

वक्त है ये कैसा….
ये कैसा धुआं है…
पिघलती बर्फ से…..
मैं जमी जाती हूँ…
आँखें बंद करके..
लेटती हूँ जैसे ही….
चीत्कार सुन….
काँप जाती हूँ….

उस कवि को बाहर आने दीजिये ...बहुत अच्छा लिख रहीं हैं.....!!

Suman said...

nice

अमिताभ श्रीवास्तव said...

kaafi puraani likhi gai kavita..aaj pahli baar aapke blog par aakar padhhi to lagaa..aakhir kyu aap nahee likh rahi he? jun 23 ke baad???
bahut khoobsoorati se rachi gai he aapki kavita.../chaaunga..pls likhti rahe...

laveena said...

Thanks Harkirat g..its olwayz a compliment itself that you have gone through my lines..thanks for your precious words...
Thanks Suman and Amitabh g...kuchh vyast hu sliye khud se rubaru nahi ho pati aur likh nahi pati ....aapki hausla afzahi ka shukriya..!!

Sonal Rastogi said...

Di, Kalam kaa sahara bahut bada hota hai...kam se kam kalam to humaare dil ke ehsaason ko samjh sakti hai......

rahul kumar said...

शब्दों को जोड़ा खूबसूरती से है। लड़कियां परिजनों के प्रति संवेदनशील होती ही हैं। आप भी हैं। कविता आपने अच्छी लिखी। मिस यू पापा भी बेहतर है। संतुलन से भरी।

laveena said...

thx rahul...

M VERMA said...

ऐसा ही होता है….
जब आसमा ….
सर से सरकता है….
और ज़मी जाने को होती है…
जी हाँ ऐसा ही होता है -- खूबसूरत शब्दों का चयन और सुन्दर भाव