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Monday, May 16, 2011

नया आसमा


दौर ए वक़्त ऐसा भी हमने देखा
समन्दरों को साहिलों से बचते देखा

 जंग गैरों से होती , तो ताज मेरा था
शिकस्त पे अपनी , अपनों को हँसते देखा

डूबता जान मुझे जो तमाशबीन हुए
बेबसी पे अपनी उन्हें हाथ मलते देखा


बाहें फैलाये नया आसमा बुलाता है मुझे
यूँ तो बहुतों को मिटटी में मिलते देखा..!!
 

3 comments:

Daily Dreamz... said...

amazing :)

Daily Dreamz... said...

daur-e-waqt aisa bhi maine dekha
ufante samandar se tujhe ladte dekha
woh jo aaj hanste hain tujh par kal royenge
waqt ki tapish mein jal tujhe kundan bante dekha
gark ho jayenge tamashbeen ek din
apne hee hathon se muh par kalikh malte dekha
ja woh aasmaan bhi bulata hai tujhe
naye pankhon se tujhe parwaz buland karte dekha

Sonal Rastogi said...

दीदी आँखे नम ही रहती है सबकी आजकल ये बात और है की वजह अलग अलग है ... आपकी नज़्म सच्चाई है